गीत: आओ बच्चों, सब हाथ मिलाएँ
आओ बच्चों सब हाथ मिलाएँ,
दिल से दिल तक राह बनाएँ।
उजाला अब इस धरती पर हम
मिलकर ऐसा कदम उठाएँ।
आओ बच्चों सब हाथ मिलाएँ,
दिल से दिल तक राह बनाएँ।
ना कोई आगे, ना कोई पीछे,
हाथ पकड़ हम सब कदम बढ़ाएँ।
एक नये संसार में दीपक बन हम
मिलकर एक सूरज हो जाएँ।
आओ बच्चों सब हाथ मिलाएँ,
दिल से दिल तक राह बनाएँ।
शांति और प्रेम डगर पर
क्यों ना मिलकर हम सब एक हो जाएँ।
खेल–खेल में हम सबको अब
मिलकर आओ पाठ पढ़ाएँ।
आओ बच्चों सब हाथ मिलाएँ,
दिल से दिल तक राह बनाएँ।
उद्देश्य
दूसरे के दुख में सुख खोजना हिंसा है | अगर हम किसी को पीछे छोड़ने में सुख और आनंद खोज रहे हैं तो निश्चित है हम हिंसा कर रहे हैं । कंपटीशन माइंडसेट से हम यही कर रहे हैं । अगर एक कक्षा में २० बच्चे हैं और सभी के किसी परीक्षा में 70% आते हैं और वहीँ दूसरी एक कक्षा में २० बच्चें हैं और सबसे ज्यादा अंक एक बच्चे के आते हैं लेकिन 60% ही आते हैं तो भी वह 70% वाले से ज्यादा ख़ुशी महसूस करता है तो इसका मतलब क्या है , क्युकी उसने बाकि 19 बच्चों को पीछे छोड़ दिया, यह कंपटीशन का परिणाम है। इससे बहुत नुकसान हुआ है | बच्चों की नजर खुद से ज्यादा दूसरे पर आ जाती है और वह खुद से दूर चला जाता है जिसका एक परिणाम हम देख रहे हैं की सारी जेनरेशन कंपटीशन के चलते अपने आप को फैशन से सेटिस्फाई करने में लगी है। सभी को एक से बढ़कर एक चीज चाहिए ताकि वह खुद को सुपीरियर साबित कर सके। कंपटीशन एटीट्यूड के चलते हम पूरी जिंदगी दूसरों को साबित करने में गुजार देते हैं और आखरी में पातें हैं कि जीवन पूरा व्यर्थ कर दिया ना तो यह लोग मेरे किसी काम आए ना मेरे समय का उपयोग मैं खुद की विजडम से जीवन को जानने और उसे जीने में कर सका | कंपटीशन के चलते हम अनजाने में अपने आसपास के लोगों को अपना शत्रु बना बैठते हैं और यह इतने अनजाने में होता है कि किसी को आभास भी नहीं होता, क्योंकि अगर आपने अपने आप को दूसरों से बड़ा दिखाने की प्रवृत्ति विकसित की है तो निश्चित तौर पर आप दूसरों को अपने से छोटा दिखाना चाहते हैं और अगर वह आपसे बड़े होने लगेंगे तो आप उनके प्रति ईर्ष्या और द्वेष भरेंगे और ऐसा ही दूसरे जिन्हें कंपटीशन सिखाया जा रहा है वह आपके प्रति ईर्ष्या और द्वेष से भरेंगे और यही हमारी सोसाइटी में हो रहा है साथ ही हम चाहते हैं कि हम बच्चों को प्रेम से जीना सिखाए इसलिए हम उन्हें शब्दों के रट्टे लगवाते हैं कि सभी से प्रेम करें, पर हम प्रोत्साहन उसे देते हैं जो कंपटीशन में फर्स्ट आता है; यानी प्रेम हमारे लिए सिर्फ नैतिकता रह गयी है और ईर्ष्या और द्वेष हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया है। इसका परिणाम यह होता है कि हम खुद पूरे जीवन एक भ्रम में जीते हैं कि हम तो प्रेम सिखाते हैं फिर समाज में इतनी अशांति और हिंसा क्यों है जबकि हम अनजाने हिंसा ही सीख रहे हैं। दूसरा सबसे घातक परिणाम यह होता है की बचपन से ही बच्चे तनाव में आने लगते हैं क्योंकि उनका पूरा आनंद, सारी खुशी इस बात से जोड़ दी जाती है कि वह दूसरों से कितने बेहतर हैं। याद रहे जो व्यक्ति भी खुद से दूर जाएगा जिसका ध्यान भी अपनी बजाये दूसरे पर ज्यादा होगा वह तनाव में आएगा ही। कंपटीशन के चलते हम अपने बच्चों को ऐसे ही दौड़ाये चले जाते हैं पहले पेरेंट्स और फिर टीचर फिर समाज और इंसान फिर खुद इसी का आदी हो जाता है। सारा विश्राम जीवन से चला जाता है जीवन एक सतत ऐसी दौड़ हो जाती है जिसमें पहुंचना कहीं नहीं होता सिवाए मौत के।
प्रतिस्पर्धा और इसके परिणाम
एक दिन विद्यालय ने बच्चों को घुमाने के लिए पास के सुंदर बाग़ में ले जाने की योजना बनाई। बाग़ हरा-भरा था और उसमें हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। पक्षियों की चहचहाहट और ठंडी हवा ने बाग़ को और भी मनमोहक बना दिया था। सभी बच्चे उत्साह से भरपूर थे और अपने शिक्षकों के साथ छोटे-छोटे समूहों में घूमने लगे।
घूमते-घूमते बच्चों ने एक विशाल आम का पेड़ देखा। पेड़ पर बहुत से पके हुए आम लगे थे, जो देखने में बेहद आकर्षक लग रहे थे। बच्चों के मन में तुरंत आम तोड़ने का ख्याल आया।
श्याम, जो बहुत जोशीला और जल्दीबाजी में रहने वाला बच्चा था, बोला, “मैं सबसे पहले आम तोड़कर लाऊंगा।” वह पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन पेड़ बहुत ऊंचा था। कई बार कोशिश करने के बावजूद श्याम सफल नहीं हुआ और थककर नीचे बैठ गया।
तभी अंकुर, जो अपनी लंबाई पर बहुत गर्व करता था, बोला, “मैं तुमसे लंबा हूं, इसलिए मुझे यह काम करने दो।” उसने भी कोशिश की, लेकिन पेड़ की ऊंचाई इतनी ज्यादा थी कि वह भी आम तक नहीं पहुंच सका।
यह सब देख रही अनजली, जो बहुत समझदार और शांत स्वभाव की थी, ने सुझाव दिया, “इस तरह हम अकेले सफल नहीं हो सकते। यदि हम प्रतिस्पर्धा छोड़कर एक-दूसरे का सहयोग करें, तो हम आम तोड़ सकते हैं। आम थोड़े होंगे, लेकिन हम उन्हें आपस में बांट लेंगे।”
सभी को अनजली की बात समझ में आ गई। उन्होंने एक योजना बनाई। सबसे छोटे और हल्के बच्चे को ऊपर चढ़ाने के लिए सबने मिलकर सहारा दिया। बच्चा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा और आसानी से आम तोड़ लाया। सभी बच्चे बहुत खुश हुए और मिल-बांटकर आम खाए।
प्रतिस्पर्धा से ज्यादा महत्व सहयोग का है। मिल-जुलकर किए गए कार्य न केवल सफलता दिलाते हैं, बल्कि आपसी रिश्तों को भी मजबूत बनाते हैं।
सहयोग और प्रेम सिखाने के फायदे
गतिविधियाँ
अवधि: 2 मिनट, 3 बार दोहराएं
क्रियाविधि:
छात्र गोल घेरे में खड़े हों।
वे ताली बजाते हुए लयबद्ध रूप से “थैंक्स, थैंक्स, थैंक्स” बोलें।
यह क्रिया 2 मिनट तक करें और इसे सत्र में 3 बार दोहराएं।
उद्देश्य:
छात्रों को हर स्थिति, सफलता और असफलता के लिए आभारी होना सिखाना।
आलोचना करने के बजाय स्वीकृति की भावना विकसित करना।
सकारात्मक सोच और आपसी सराहना का निर्माण करना।
क्रियाविधि:
छात्रों को छोटी-छोटी साझा करने की गतिविधियाँ सौंपें, जैसे:
लंच के समय अपने भोजन को साथियों के साथ साझा करना।
जरूरतमंदों को खिलौने, कपड़े, या किताबें दान करना।
सामूहिक चर्चा करें कि साझा करने से उन्हें कैसा महसूस हुआ और इसका दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ा।
उद्देश्य:
सहानुभूति और उदारता को प्रोत्साहित करना।
प्रेम और दूसरों के प्रति करुणा की भावना विकसित करना।
क्रियाविधि:
एक बड़ा चार्ट पेपर दें, जिसमें खाली शाखाओं वाला पेड़ बना हो।
छात्रों से पत्तियाँ, शाखाएँ, पक्षी या फल बनवाएँ, जो विकास और जीवंतता का प्रतीक हों।
उन्हें यह समझाएँ कि जैसे पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही उन्हें भी अपने आत्म-विकास पर ध्यान देना चाहिए।
उद्देश्य:
प्रतियोगिता की बजाय व्यक्तिगत प्रगति के महत्व को रेखांकित करना।
आत्म-सुधार और सामूहिक रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना।
क्रियाविधि:
कक्षा को छोटे-छोटे समूहों में बाँटें।
प्रत्येक समूह को एक विषय दें और उसे मिलकर अध्ययन करने और कक्षा में प्रस्तुत करने के लिए कहें।
उद्देश्य:
सहयोग और टीमवर्क को बढ़ावा देना।
आपसी सीखने और साझा विकास को प्रोत्साहित करना।
क्रियाविधि:
छात्रों को दयालुता और सहानुभूति दर्शाने वाले चित्र दिखाएँ, जैसे किसी जरूरतमंद की मदद करना या जानवरों की देखभाल करना।
चर्चा करें कि इन चित्रों को देखकर उन्हें क्या महसूस होता है।
छात्रों को अपनी खुद की इसी तरह की कहानियाँ साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें।
उद्देश्य:
भावनात्मक बुद्धिमत्ता और समझ का विकास करना।
छात्रों को दूसरों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करना।
क्रियाविधि:
छात्रों को जोड़ी में बाँटें और अपने साथी की सकारात्मक विशेषताओं की सूची बनाने को कहें।
इन विशेषताओं को कक्षा के साथ साझा करें।
अधिक भागीदारी के लिए जोड़ी को बदलें।
उद्देश्य:
आपसी सम्मान और प्रोत्साहन की संस्कृति का विकास करना।
छात्रों को दूसरों की ताकत को महत्व देना सिखाना।
बच्चों से संवाद करने के महत्वपूर्ण प्रश्न
👉 उत्तर (उदाहरण):
“मैं ‘सच्चाई’ को चुनूंगा, क्योंकि जब मैं सच बोलता हूँ तो मुझे डर नहीं लगता और मम्मी-पापा भी मुझ पर भरोसा करते हैं।”
✳ (मकसद): आत्म-जागरूकता और मूल्यों की व्यक्तिगत प्राथमिकता पर सोच विकसित करना।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“मेरे पेड़ में ‘सम्मान’, ‘धैर्य’, ‘दया’ और ‘कर्तव्य’ के पत्ते होंगे। वो पेड़ मजबूत होगा, जिसकी जड़ें मम्मी-पापा की सीख से बनी होंगी।”
✳ (मकसद): मूल्य-आधारित सोच को विज़ुअल इमेजिनेशन से जोड़ना।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“एक बार मैंने गलती से स्कूल की किताब गुम कर दी, पर मैंने मम्मी को बता दिया। उन्होंने डाँटा नहीं, बल्कि कहा कि सच बोलना सबसे अच्छा था।”
✳ (मकसद): नैतिक निर्णय और भावनात्मक निडरता को उजागर करना।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“मेरे दोस्त ने मेरी ड्राइंग फाड़ दी थी, पर मैं चुप रहा। बाद में उसने माफ़ी माँगी। मुझे लगा कि गुस्से से दोस्ती टूट सकती थी।”
✳ (मकसद): संयम और माफ़ करने की कला को पहचानना।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“मैं ‘ईमानदारी संस्कार’ हूँ। मैं बच्चों से कहूँगा – जब भी डर लगे, मुझसे दोस्ती कर लो, मैं तुम्हारे दिल को मजबूत बना दूँगा।”
✳ (मकसद): कल्पनाशील तरीके से भावनात्मक जुड़ाव और संवाद सिखाना।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“प्यारे मम्मी-पापा,
मैं आजकल सच बोलने की, समय पर उठने की और सभी से विनम्रता से बात करने की कोशिश कर रहा हूँ।
आपका बेटा – संस्कारी बनने की राह पर। ❤️”
✳ (मकसद): आत्मचिंतन और संस्कारों का पारिवारिक संवाद।
👉 उत्तर (उदाहरण):
“मैं अनाथालय में बच्चों के साथ खेलने और उन्हें कहानियाँ सुनाने जाना चाहता हूँ, ताकि मैं सेवा और प्रेम का अभ्यास कर सकूँ।”
✳ (मकसद): विचार को एक्शन में बदलने की आदत डालना।